कुॅवर नारायण जीवन परिचय प्रमुख रचनाएं , भावपक्ष-कलापक्ष पाठ - 3 कक्षा-12 kunwar Narayan jivan parichay pramukh rachnay, bhavpaksh kalapaksh Path 3 class 12
आधुनिक हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर एवं 1959 में 'अज्ञेय' द्वारा सम्पादित 'तीसरा सप्तक' के प्रमुख कवियों में से एक कुँवर नारायण का जन्म 19 सितम्बर, 1927 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में हुआ था। कुँवर जी की प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई । आपने 1951 में लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. किया। आप उत्तर प्रदेश के संगीत नाटक अकादमी के 1976 से 1979 तक उप-पीठाध्यक्ष रहे और 1975 से 1978 तक अज्ञेय द्वारा सम्पादित मासिक पत्रिका 'नया प्रतीक' के सम्पादक मण्डल के सदस्य भी रहे।
आपकी साहित्य सेवा के लिए आपको 2009 में वर्ष 2005 के देश के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मान 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त कुँवर जी को 'साहित्य अकादमी पुरस्कार', 'व्यास सम्मान', केरल के 'कुमार आशान पुरस्कार', 'प्रेमचंद पुरस्कार', 'तुलसी पुरस्कार', 'उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान पुरस्कार', 'राष्ट्रीय कबीर सम्मान', 'शलाका सम्मान', 'मेडल ऑफ वॉरसा यूनिवर्सिटी', पोलैण्ड और रोम के 'अन्तर्राष्ट्रीय प्रीमियो फेरेनिया सम्मान' और 2009 में प्रतिष्ठित 'पद्मभूषण' से भी अलंकृत किया जा चुका है।
हिंदी के इस विलक्षण कवि का दिल्ली में 25 नवम्बर, 2017 को 90 वर्ष की आयु ल में निधन हो गया।
• रचनाएँ -
• (1) काव्य संग्रह- 'चक्रव्यूह' (1956),
• 'तीसरा सप्तक' (1961),
• 'परिवेश : हम तुम' (1961),
• 'अपने सामने' (1979),
• 'कोई दूसरा नहीं' (1993),
• 'कविता के क बहाने' (1993),
• 'इन दिनों' (2002)।
(2) प्रबन्ध काव्य- 'आत्मजयी' (1965)।
(3) खण्डकाव्य - 'वाजश्रवा के बहाने' (2008) ।
(4) कहानी संग्रह - ' आकारों के आस-पास' (1973)।
(5) समीक्षा- 'आज और आज से पहले' (1998), 'साहित्य के अन्तर्विषयक कुछ
सन्दर्भ' (2003)।
(6) सामान्य- 'मेरे साक्षात्कार' (1999)।
(7) संकलन - 'कुँवर नारायण संसार' (2002), 'कुँवर नारायण उपस्थिति' (2002), 7. 'कुँवर नारायण-चुनी हुई कविताएँ' (2007), 'कुँवर नारायण- प्रतिनिधि कविताएँ' (2008)। (8) अनुवाद - 'तनाव' पत्रिका के लिए कवाफी तथा ब्रोर्खेस की कविताओं का पद अनुवाद।
भावपक्ष
मानवीय सम्बन्धों का चित्रण-कुँवर जी ने अपनी पूरी काव्य यात्रा में मानवीय सम्बन्धों को नई तरह से परिभाषित किया। नव सामाजिक मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा स्पष्ट झलकती है। पुरानी और रूढ़ि हो चुकी अवैज्ञानिक मान्यताओं के प्रति उनके मन में जो गुस्सा था, वह उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है। राजनीतिक खोखलेपन पर प्रहार- कुँवर जी ने अपनी कविताओं में समय-समय पर सत्ता की राजनीति पर तीक्ष्ण प्रहार किये हैं। नागरीय संवेदना-कुँवर नारायण नागरीय संवेदना के प्रतिनिधि कवि हैं। यह पक्ष उनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकता है। नगर तथा महानगरीय सभ्यता का यथार्थपरक चित्रण आपकी रचनाओं में दिखाई देता है। प्रतीकात्मकता-कुँवर नारायण ने अपनी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के लिए प्रतीकात्मकता को माध्यम बनाया है। उनका काव्य संग्रह 'चक्रव्यूह' एक प्रतीकात्मक रचना है जिसमें कुँवर जी ने समकालीन समस्याओं में डूबे मानव को विघटनकारी सात महारथियों से घिरे अर्जुन पुत्र अभिमन्यु के रूप में चित्रित किया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण- आपने अपनी रचनाओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रमुखता दी है।
कलापक्ष
भाषा-कुँवर नारायण ने अपनी कविताओं में विषय-विविधता के साथ-साथ अनेक भाषाओं का प्रयोग किया है। उनके काव्य की प्रमुख भाषा साहित्यिक खड़ी बोली है जिसमें अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, तत्सम और तद्भव शब्दावली का प्रयोग है। उनकी भाषा सीधी, सरल एवं चुटीली है। शैली - कुँवर नारायण की शैली विषयानुरूप है जो अत्यन्त संजीदा, गम्भीर, विचारात्मक एवं प्रतीकात्मक है। प्रतीकात्मकता इनकी शैली की विशिष्टता है।
अलंकार योजना- अपनी रचनाओं में कुँवर नारायण ने अलंकारों का प्रयोग कम ही किया है। इनकी कविताओं में अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। प्रमुख रूप से अनुप्रास, यमक, उपमा, पदमैत्री, स्वरमैत्री, रूपक इत्यादि अलंकारों के प्रयोग से आपकी कविताएँ अत्यन्त प्रभावी बन पड़ी हैं। छंद योजना- आपने अपने काव्य में मुख्य रूप से मुक्तक छंद का प्रयोग किया है। आपकी कविताओं में परम्परागत छंद का आग्रह न होकर एक आन्तरिक लय और गति है, जो उसे काव्यात्मक गीतिमयता प्रदान करती है।
• साहित्य में स्थान- -कुँवर नारायण की प्रतिष्ठा और आदर हिंदी साहित्य जगत में सर्वमान्य है। उनकी ख्याति मात्र एक लेखक की तरह ही नहीं, बल्कि कला की अनेक विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले रसिक विचारक के समान भी है। कुँवर नारायण यद्यपि अब हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उनके द्वारा रचे गये काव्य-मूल्य हिंदी साहित्य की अनमोल विरासत हैं।
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