गोस्वामी तुलसीदास जीवन परिचय प्रमुख रचनाएं भावपक्ष कलापक्ष पाठ- 8 कक्षा 12 Goswami Tulsidas jivan Parichay Pramukh rachnaen bhavpaksh kalapaksh paath 8 class 12
गोस्वामी तुलसीदास का कोई प्रामाणिक जीवन परिचय उपलब्ध नहीं है। उनकी जन्म तिथि, जन्म-स्थान, माता-पिता और विवाहादि के सम्बन्ध में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं। फिर भी तुलसी के जीवन-वृत्त से सम्बन्धित जो भी सामग्री मिलती है उसके आधार पर कहा जाता है कि उनका जन्म सन् 1532 में बाँदा जिले के राजापुर नामक स्थान में हुआ था। परन्तु कुछ लोग सोरों (एटा) को इनका जन्म स्थान मानते हैं। इनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी था। कहा जाता है कि इनका जन्म अभुक्तमूल नामक अनिष्टकारी नक्षत्र में होने के कारण इनके माता-पिता ने इन्हें जन्म होते ही त्याग दिया था। स्वामी नरहरिदास के सान्निध्य में इन्होंने वेद-पुराण एवं अन्य शास्त्रों का अध्ययन किया। तुलसीदास का विवाह दीनबन्धु पाठक की सुन्दर कन्या रत्नावली के साथ हुआ। किंवदन्ती है। कि रत्नावली के व्यंग्य बाणों से आहत होकर ही तुलसी को संसार और सांसारिक ऐश्वयों से विरक्ति हो गई और सब कुछ छोड़कर वह काशी चले गए। कुछ समय पश्चात काशी छोड़कर तुलसीदास अयोध्या चले गए और वहीं पर 'रामचरितमानस' का प्रणयन किया। सन् 1623 में काशी (वर्तमान में वाराणसी) में इस महात्मा ने शरीर के बन्धनों को तोड़ दिया और परमतत्व में विलीन हो गए।
प्रमुख रचनाए-
रचनाएँ उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं- 'दोहावली', 'कवितावली', 'रामचरितमानस', 'विनय पत्रिका', 'रामाज्ञा प्रश्न', 'हनुमान बाहुक', 'रामलला नहछू', 'पार्वती मंगल', 'बरबै रामायण', 'संदीपनी' तथा 'गीतावली'। 'रामचरितमानस' हिंदी साहित्य का सर्वोत्कृष्ट महाकाव्य है। सोहर छंदों में लिखे
हुए 'रामलला नहछू', 'जानकी मंगल' और 'पार्वती मंगल' अच्छे खण्डकाव्य हैं। 'गीतावली', 'कृष्ण गीतावली', 'विनय पत्रिका' हिंदी के सर्वोत्तम गीतिकाव्यों में से हैं। 'विनय पत्रिका' हिंदी के विनय काव्यों में श्रेष्ठ है। 'कवितावली' मुक्तक काव्य परम्परा की उत्कृष्ट रचना है।
भावपक्ष
(1)राम चरित्र की प्रधानता- तुलसी के प्रायः सम्पूर्ण काव्य में राम चरित्र की प्रधानता है। पार्वती मंगल, कृष्ण गीतावली और हनुमान बाहुक को छोड़कर हम कह सकते हैं कि सम्पूर्ण काव्य राममय है। 'राम सौं खरो है कौन, मोसौं कौन खोटी' कहकर राम की श्रेष्ठता को स्वीकार किया है। राम उनके जीवन के आधार हैं। उन्होंने राम के गुणगान करने वाले साहित्य को सार्थक माना है।
(2) भक्ति भावना-तुलसी 'रामभक्ति' शाखा के प्रमुख कवि थे। धार्मिक दृष्टि से उदार होने का परिचय उन्होंने शिव, दुर्गा, गणेश आदि सभी देवी-देवताओं की स्तुति करके दिया है। तुलसी की भक्ति दास्य-भक्ति है। इसीलिए वे 'राम बोला नाम है गुलाम राम साहि कौ' के रूप में अपना परिचय देते हैं।
उन्होंने रामचरितमानस में नवधा भक्ति का वर्णन किया है। प्रेमाभक्ति पर अधिक बल देने वाले तुलसी ने लिखा है- एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास ॥
"एक भरोसौ एक बल, एक आस विश्वास ।
(3) लोकमंगल की भावना-लोकमंगल की भावना तुलसी के काव्य का आधार है उनके आराध्य 'मंगल भवन अमंगलहारी' हैं। शबरी, गीध, अजामिल आदि सबको मुक्ति प्रदान करने वाले भगवान राम लोक कल्याणकारी हैं।
(4) समन्वय की भावना-तुलसीदास महान कवि, लोकनायक एवं समन्वयकारी लोकरक्षक थे। उनका आविर्भाव ऐसे युग में हुआ जब सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में सर्वत्र अव्यवस्था, अराजकता और घोर निराशा व्याप्त थीं। उन्होंने तत्कालीन झगड़ों तथा साम्प्रदायिक विरोधों को दूर किया। उन्होंने शैव और वैष्णव के विरोधों को दूर करके धार्मिक समन्वय का भी प्रयास किया। उनके साहित्य में परस्पर विरोधी विचारों का समन्वय है। लोक और साहित्य का समन्वय, भक्ति, ज्ञान और कर्म का समन्वय; सगुण और निर्गुण का समन्वय, द्वैत, अद्वैत और द्वैताद्वैत का समन्वय, धर्म, संस्कृति और समाज का समन्वय आदि महान समन्वयकारी कवि तुलसीदास द्वारा किये गये हैं।
(5) शक्ति, शील और सौन्दर्य का चित्रण -तुलसीदास ने अपने भगवान श्रीराम में इन तीनों गुणों के अपार भण्डार को देखा है। जहाँ दशरथ पुत्र राम कोमल स्वरूपवान किशोर हैं वहाँ उनकी सुन्दरता करोड़ों कामदेवों से भी अधिक है। उनमें कैकेयी के कटु वचनों को सहन करने का शील है। तुलसी के राम की अपार शक्ति, वहाँ प्रदर्शित होती है जहाँ लक्ष्मण सीता जी से कह उठते हैं कि- 'भृकुटि विलास सृष्टि लय होई, सपनेहुँ संकट परहिं कि सोई।'
(6) रस- योजना- तुलसी का काव्य शान्त रस प्रधान है। इसमें शृंगार के दोनों पक्षों का परिपाक हुआ है। जहाँ सीताजी पुष्प वाटिका में रामचन्द्र के प्रथम दर्शन करती हैं वहाँ संयोग शृंगार का मनोहारी चित्रण है। सीताहरण के पश्चात् वियोग श्रृंगार का परिपाक हुआ है। राम-वन-गमन के समय करुण रस की आस्वादकता से किसका हृदय करुण क्रन्दन नहीं करता है ? लक्ष्मण परशुराम संवाद में रौद्र और वीर रस का संचरण होता है। लंका काण्ड में वीर, रौद्र, वीभत्स, भयानक, अद्भुत आदि रसों की अभिव्यक्ति हुई है।
• कलापक्ष -
(1) भाषा-तुलसीदास का अवधी एवं ब्रज भाषा दोनों पर समान अधिकार था। 'कवितावली', 'गीतावली', 'कृष्ण गीतावली', 'विनय पत्रिका' आदि ब्रज भाषा की रचनाएँ हैं। इनकी भाषा में लोकोक्तियों और मुहावरों का भी प्रयोग हुआ है। भाषा की प्रांजलता ने काव्य में चार चाँद लगा दिये हैं।
(2) शैली-तुलसीदास ने अपने पूर्ववर्ती कवियों की सम्पूर्ण शैलियों का प्रयोग अपने काव्य में किया है। प्रबन्ध शैली का प्रयोग 'रामचरितमानस' में किया है जिस पर जायसी की दोहा चौपाई वाली पद्धति का प्रभाव है। 'विनय पत्रिका' में गेय पद शैली है। 'दोहावली' दोहा में रचित है, 'कवितावली' में कवित्त सवैया शैली का प्रयोग मिलता है। 'वरबै रामायण' में छप्पय शैली का प्रयोग किया है। तुलसी ने कथा वृत्तों आदि में वर्णनात्मक एवं उपदेशात्मक शैली का प्रयोग किया है।
(3) अलंकार- योजना- तुलसी के काव्य में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, सन्देह, भ्रान्तिमान,अपह्नुति आदि अलंकारों का वर्णन स्वाभाविक रूप से हुआ है। काव्य में चमत्कार की दृष्टि से केशव की तरह अलंकारों की भरमार नहीं की है।
(4) छंद-योजना- तुलसी ने सामान्य रूप से प्रचलित तत्कालीन सभी छंदों का प्रयोग अपने काव्य में किया है। दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त, सवैया, छप्पय, पद आदि इनके प्रिय छंद रहे हैं। संस्कृत के श्लोकों का भी यत्र-तत्र प्रयोग किया गया है।
साहित्य में स्थान-
गोस्वामी तुलसीदास लोक कवि हैं। उनके काव्य से जीने की कला सीखी जा सकती है। वास्तव में, तुलसीदास हिंदी के श्रेष्ठ कवि थे। 'सूर-सूर तुलसी शशि' कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है। मानव जीवन का सर्वांगीण चित्रण तुलसीदास ही कर पाये हैं। तुलसी वास्तव में जननायक थे। लोकनायक के हृदय में लोकमंगल की कामना थी। यद्यपि उन्होंने 'स्वान्तः सुखाय' काव्य-रचना की है परन्तु वह काव्य परान्तः सुखाय है।
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