फिराक गोरखपुरी जीवन परिचय प्रमुख रचनाएं भावपक्ष कलापक्ष पाठ 9 कक्षा 12 firak gorakhpuri jeevan parichay Pramukh rachnaen bhav pakshkala paksh paath 9 class 12

           फ़िराक़ गोरखपुर


                 • जीवन-परिचय- 

फ़िराक़ गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त, 1896 को गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में एक कायस्थ परिवार में हुआ। आपका वास्तविक नाम रघुपति सहाय था। एक शायर के रूप में आप अपना उपनाम 'फिराक' लिखते थे। बाद में आप अपने लोकप्रिय नाम 'फ़िराक़ गोरखपुरी' के नाम से जाने जाने लगे। आपके पिता का नाम मुंशी गोरख प्रसाद था। वह पेशे से वकील थे और गोरखपुर के अग्रणी अधिवक्ता माने जाते थे।

आपकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा गोरखपुर में ही हुई। आपने 1917 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अपनी स्नातक की उपाधि अर्जित की। बाद में आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही उर्दू, फारसी और अंग्रेजी साहित्य में मास्टर्स डिग्री पूरी की। 1917 में ही आप डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित हुए। 1930 से 1959 तक आप इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग में अध्यापक रहे।

आपको 'गुले नग्मा' के लिए प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बाद में 1970 में इनकी साहित्यिक सेवा को दृष्टिपथ पर रखकर आपको साहित्य अकादमी का सदस्य मनोनीत किया गया। फ़िराक़ गोरखपुरी को 'साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सन् 1968 में भारत सरकार ने 'पद्म भूषण' से अलंकृत किया। अन्त में, 3 मार्च, 1982 (एनसीईआरटी पुस्तक के अनुसार 1983) को दिल्ली में उर्दू शायरी के इस जगमगाते सितारे ने काव्य- रसिकों से सदा के लिए विदा ली।

                  • रचनाएँ-

 (1) मुख्य कृतियाँ- 'गुले नग्मा', 'बज़्मे- ज़िन्दगी', 'रंगे-शायरी', 'उर्दू 'ग़ज़ल गोई', 'गुले-रअना', 'रूहे कायनात', 'मशअल', 'शबिस्तान', 'सरगम', 'परछाइयाँ',
'तराने-इश्क' आदि। 

(2) रूबाइयाँ- 'सत्यम् शिवम् सुन्दरम्', 'रूप'।

(3) उपन्यास - 'साधु और कुटिया' ।

(4) गद्य कृतियाँ- फ़िराक़ गोरखपुरी की उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी भाषा में 10 गद्य रचनाएँ भी प्रकाशित हुई हैं।

                • भावपक्ष - 

(1) सौन्दर्य बोध का वर्णन-फ़िराक़ गोरखपुरी सौन्दर्य बोध के शायर हैं और यह भाव ग़ज़ल और रूबाई दोनों में बराबर व्यक्त हुआ है। फ़िराक़ साहब ने ग़ज़ल और रुबाई को नया लहजा और नई आवाज प्रदान की। फारसी, हिंदी, ब्रजभाषा और हिन्दू धर्म की संस्कृति की गहरी जानकारी की वजह से उनकी शायरी में हिन्दुस्तान की मिट्टी रच-बस गई है। यह तथ्य भी विचार करने योग्य है कि उनकी शायरी में आंशिक और महबूब परम्परा बिल्कुल अलग अपना स्वतन्त्र संसार बसाये हुए है। 

• (2) भारतीय संस्कृति का चित्रण - दैनिक जीवन के कड़वे सच और आने वाले कल के प्रति उम्मीद, दोनों को भारतीय संस्कृति और लोकभाषा के प्रतीकों से जोड़कर फ़िराक़ ने अपनी शायरी का अनूठा महल खड़ा किया। फारसी, हिंदी, ब्रजभाषा और भारतीय संस्कृति की गहरी समझ के कारण उनकी शायरी में भारत की मूल पहचान, उसकी संस्कृति एवं तीज-त्यौहार रच-बस गये हैं।

(3) वात्सल्य रस का वर्णन-फ़िराक़ गोरखपुरी की शायरी, विशेषकर उनकी रूबाइयों मैं उर्दू शायरी की रिवायत के विपरीत वात्सल्य रस की सुन्दर एवं मनमोहक अभिव्यक्ति हुई है। उन्होंने अपनी कई रचनाओं में माँ के अपने बच्चे के प्रति वात्सल्यपूर्ण अनुराग की दर्शनीय अभिव्यक्ति की है।

(4) नवीन विषयों पर साहित्य सृजन- उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा रूमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता से बँधा रहा है जिसमें लोकजीवन और प्रकृति के पक्ष बहुत कम उभर पाए हैं। फ़िराक़ ने परम्परागत भावबोध और शब्द भण्डार का उपयोग करते हुए उसे नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा। उनके यहाँ सामाजिक दुःख-दर्द व्यक्तिगत अनुभूति बनकर शायरी में ढला है।

(5) प्रकृति वर्णन - फ़िराक़ गोरखपुरी की रचनाओं में उनका प्रकृति-प्रेम स्पष्ट झलकता है। व्यक्तिगत जीवन में अनेक कठिनाइयों एवं झंझावातों के बीच उनका रुझान प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य को निहारने एवं उसका सजीव वर्णन करने में लगा रहा।

                • कलापक्ष - 

(1) भाषा- फ़िराक़ गोरखपुरी मूल रूप से उर्दू के शायर (कवि) हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं में उर्दू, फारसी, साधारण बोलचाल, हिंदी की खड़ी बोली की शब्दावली का प्रयोग किया है। फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपनी शायरी में नई भाषा और नए शब्दों का जमकर प्रयोग किया है।

(2) शैली-उर्दू में शेर लिखे नहीं कहे जाते हैं। यानी एक तरह का संवाद प्रमुख होता है। 'मीर' और 'गालिब' की तरह फ़िराक़ ने भी कहने की इसी शैली को साधकर आम आदमी से अपनी बात कही है।

(3) अलंकार - योजना- फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपनी रचनाओं में दोनों प्रकार के अलंकारों- शब्दालंकार एवं अर्थालंकार का सटीक प्रयोग किया है। इनकी शायरी में मुख्य रूप से अनुप्रास, पदमैत्री, स्वरमैत्री, पुनरुक्तिप्रकाश, उपमा, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण, सन्देह इत्यादि अलंकारों का प्रयोग देखने को मिलता है।

(4) छंद-योजना- फ़िराक़ गोरखपुरी वस्तुतः उर्दू के शायर कवि हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं में उर्दू के प्रचलित सभी छंदों; जैसे-रूबाई, ग़ज़ल, नज्म आदि में अपना काव्य-संसार रचा है।

             • साहित्य में स्थान-

 फ़िराक़ गोरखपुरी उर्दू नक्षत्र का वह जगमगाता सितारा है जिसकी रोशनी आज भी शायरी को एक नया आयाम प्रदान कर रही है। इस अलमस्त शायर की शायरी की गूँज आज भी काव्य-रसिकों के हृदय में गूँजती है। उर्दू ग़ज़ल-शायरों के बीच फ़िराक़ गोरखपुरी का नाम अत्यन्त सम्मान के साथ लिया जाता है। उर्दू-साहित्य में उनका स्थान अत्यन्त उच्चकोटि का है।

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